किसी को आखिर क्रोध क्यों आता है? जब किसी की मानसिकता को ठेस पहुंचता है या किसी की भावना आहत होती है, तो वह क्रोधित हो जाता है। जब कोई मानसिक रूप से किसी बात का विरोध करने लगता है, तो उसे क्षोभ होता है। यह हमारे शरीर में रहने वाला एकमात्र शत्रु है, जो हमें ही नुकसान पहुंचाता है।
क्रोध विनाश करता है। कभी गुस्सा नहीं होना चाहिए। यह व्यक्ति की मति और बुद्धि को बर्बाद करता है। लोग इससे प्रेरित होकर अक्सर गलत निर्णय लेते हैं। इसलिए लोग सही-गलत में अंतर नहीं कर पाते और वहशी बन जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप आदमी अपनापन, स्नेह, लगाव, प्रेम और आत्मीयता को भी भूल जाता है। भयभीत होने पर किसी व्यक्ति या खूंखार जानवर में कोई फर्क नहीं पड़ता।
इंसान की क्रोध कभी-कभी उसके लिए अभिशाप बन जाती है। यह मानव मन की एक भावना है, जो अक्सर अच्छी नहीं मानी जाती है। भय भी क्रोध को जन्म देता है। इंसान अपने भय को नियंत्रित करने की कोशिश करते समय रोष को व्यक्त करता है। माना जाता है कि काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह सबसे बड़े शत्रु हैं।
हमेशा एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को अच्छाई और सदाचार का प्रचार-प्रसार करने की शिक्षा देता था। वह कहते थे कि सिर्फ उपदेश देने में समय नहीं गंवाना, बल्कि अपने हाथों से दुखी, पीड़ित, असहाय और निराश लोगों की सेवा करना। यदि कोई आपसे बुरा व्यवहार करे जब वह यहाँ आकर आपकी सहायता मांगे, तो उस पर क्षोभ मत करो। वह जानते थे कि धन और संपत्ति संग्रह करने की आदत भयानक और विनाशकारी होती है। यही कारण है कि वह अपने विद्यार्थियों को सिखाता है कि वे अपनी जरूरत भर की चीजें रखें। अधिक संग्रह नहीं करना। प्राप्त भोजन से संतुष्ट रहना
उन्हें यह भी कहा कि लोग तुम्हारा विरोध करेंगे और तुम्हें मार डालेंगे। लेकिन बहुत सावधानीपूर्वक धैर्य और शांति बनाए रखना चाहिए। यह मानकर चलना कि वे आत्मा को नहीं, बल्कि शरीर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है, इसका कारण बताया गया था। वह स्पष्ट करते हुए कहा कि अहिंसा पर अटल रहने वाले को कोई नहीं मार सकता। जिसने तुम्हें घृणा की, वह खुद भगवान को घृणा करता है, क्योंकि उसी ने हम सबको बनाया है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि क्रोध नर्क का रास्ता है। उन्होंने कहा कि बात-बात पर तैश में आने वाले लोग जीवन में कभी प्रगति नहीं करते और हमेशा दुखी रहते हैं। क्रोध में आदमी कभी सही निर्णय नहीं लेता।
गुस्से में कोई खुद का नहीं रहता। वह बेकार काम करने लगता है। शास्त्रों ने इसे इंसान का सबसे बड़ा शत्रु बताया है। तब व्यक्ति अपनी नियंत्रण खो देता है और कुछ भी कर बैठता है। रोष और आंधी एक समान हैं। दोनों के शांत होने पर ही नुकसान का पता चलता है। श्रीकृष्ण ने कहा कि क्रोध सभी विपत्तियों का मूल है। यह सांसारिक बंधन का परिणाम है, जो धर्म को खत्म करता है

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