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पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने गंभीर प्रदूषण उल्लंघनों के लिए पंजाब केसरी ग्रुप के होटल के खिलाफ पंजाब सरकार की कार्रवाई को बरकरार रखा !

गंभीर प्रदूषण मामलों में बिना पूर्व सुनवाई के कार्रवाई करने का पंजाब सरकार को कानूनी अधिकार: हाईकोर्ट !

पर्यावरण नियमों के उल्लंघन के खिलाफ पंजाब सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को मजबूती देते हुए, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने शुक्रवार को पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) द्वारा चोपड़ा ग्रुप के एक होटल के खिलाफ की गई इमरजेंसी कार्रवाई की कानूनी वैधता को बरकरार रखा। उल्लेखनीय है कि चोपड़ा ग्रुप ही पंजाब केसरी मीडिया ग्रुप का मालिक भी है।

जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की डिवीजन बेंच ने पंजाब केसरी ग्रुप की कंपनी द हिंद समाचार लिमिटेड और एक अन्य याचिकाकर्ता द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा की गई कार्रवाई, जिसमें होटल को बंद करना और बिजली सप्लाई काटना शामिल है, पूरी तरह कानून के अधीन और जायज थी। यह कार्रवाई वाटर (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) एक्ट, 1974 के तहत की गई।

अदालत के इस फैसले से पंजाब सरकार का यह मत स्पष्ट रूप से स्वीकृत हो गया है कि पर्यावरण कानून हर किसी पर बराबर लागू होते हैं, चाहे संबंधित इकाई या उसका प्रभाव कितना भी बड़ा क्यों न हो। याचिकाकर्ता होटल जालंधर के सिविल लाइंस इलाके में स्थित है, जो चोपड़ा ग्रुप की व्यावसायिक संस्थाओं में शामिल है और जिसका संबंध पंजाब केसरी और हिंद समाचार अखबारों के प्रमोटरों से है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दर्ज किया कि 13 जनवरी, 2026 को की गई विस्तृत जांच में होटल के अंदर गंभीर और व्यापक स्तर के उल्लंघन सामने आए। इनमें गैर-कार्यशील सीवरेज और एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट, बिना साफ किया गंदा पानी जानबूझकर नगर निगम की सीवर लाइन में छोड़ना, हैजार्डस वेस्ट नियमों के तहत अधिकार न होना, नगर निगम से आवश्यक कानूनी मंजूरियों की कमी, हानिकारक और ठोस कचरे का गलत प्रबंधन, और वाटर एक्ट के तहत अनिवार्य सहमति शर्तों का पालन न करना शामिल हैं।

बेंच ने यह दलील स्पष्ट रूप से खारिज कर दी कि होटल को बंद करने से पहले सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए था। अदालत ने कहा कि जहां तुरंत पर्यावरण नुकसान का खतरा हो, वहां कानून प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को तुरंत कार्रवाई करने का अधिकार देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पहले नोटिस देना इमरजेंसी अधिकारों के उद्देश्य को ही विफल कर देगा, और कानून सिर्फ यह मांग करता है कि कार्रवाई के कारण लिखित रूप में दर्ज किए जाएं, न कि अनिवार्य रूप से पहले ही सूचित किए जाएं।

यहां यह उल्लेख करना उचित है कि याचिकाकर्ता के होटल की बिजली सप्लाई पहले ही काटी जा चुकी है और माननीय हाईकोर्ट द्वारा व्यावसायिक इकाई के खिलाफ की गई कार्रवाई संबंधी कोई राहत न दिए जाने के कारण स्थिति जस की तस बनी रहेगी।

हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को मनमानी या अति-कठोर दिखाने की कोशिशों को भी खारिज कर दिया और कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इमरजेंसी अधिकार लागू करने के लिए विस्तृत और उचित कारण दर्ज किए हैं। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं के लिए उचित उपाय वाटर एक्ट की धारा 33B के तहत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के पास है, न कि रिट याचिकाओं के माध्यम से।

याचिका खारिज होने से, पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के माध्यम से की गई पंजाब सरकार की कार्रवाई को अदालती तौर पर मंजूरी मिल गई है, जिससे यह सिद्धांत और मजबूत होता है कि पर्यावरण सुरक्षा और जनता का स्वास्थ्य कॉर्पोरेट विशेषाधिकारों से ऊपर हैं।

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