उदयपुर
दुनिया भर के म्यूजियम्स में एआइ के जरिए शोध, डेटा डॉक्यूमेंटेड और दर्शकों के अनुभवों को समझने के काम में लिया जा रहा है। एक तरफ एआइ जटिल और वर्षों पुराने शोध को कुछ महीनों में समेटने की ताकत दे रहा है, वहीं बिना किसी ठोस नीति, नियंत्रण और ह्यूमन जजमेंट के इसके अंधाधुंध इस्तेमाल से इतिहास और नैरेटिव बदलने का बड़ा जोखिम भी खड़ा हो गया है।
यूनेस्को और इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ म्यूजियम्स (आइकॉम) ने 90 देशों के 400 संग्रहालयों पर किए सर्वे के के बाद बताया कि 57 फीसदी म्यूजियम्स में किसी न किसी स्तर पर एआइ का उपयोग शुरू हो चुका है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इनमें से 55 फीसदी संस्थानों के पास एआइ के इस्तेमाल को लेकर अब तक न कोई स्पष्ट गाइडलाइन है, न पॉलिसी और न ही कोई तय रणनीति है।
इंसानी दखल जरूरी, एआइ का अपना कोई विवेक नहीं
रीना दीवान बताती हैं कि लोग मानते हैं कि म्यूजियम में जो लिखा या प्रदर्शित है, वह अंतिम सत्य है। ऐसे में यदि एआइ बिना किसी मानवीय नियंत्रण के व्याख्याएं गढ़ने लगे, तो तथ्य और इतिहास दोनों विकृत हो सकते हैं। जिससे स्थानीय समुदायों, जनजातीय संस्कृतियों और मूल इतिहास पूर्वाग्रह का शिकार हो सकता है।
नौकरियां छीनने की जगह नए अवसर गढ़ेगी तकनीक
इटली की शोधकर्ता सिल्विया ने बताया कि एआइ म्यूजियम पेशेवरों के लिए नए रोजगार और शोध के गहरे अवसर पैदा करेगा। इजिप्ट की ऐतिहासिक संपदाएं दुनिया भर के अलग-अलग संग्रहालयों में बिखरी हुई हैं। एआइ टूल्स के जरिए अलग-अलग देशों में मौजूद इन पुरावशेषों के डेटा को एक साथ जोड़कर 360 डिग्री समग्र अध्ययन किया जा सकता है, जिससे नए शोधकर्ताओं और क्यूरेटर्स के लिए रोजगार के नए द्वार खुलेंगे।
बिग डेटा और एआइ कैमरों से बदला जा रहा दर्शकों का अनुभव
संग्रहालयों में एआइ कैमरों और डेटा एनालिसिस से यह ट्रैक किया जा रहा है कि कौन सा पर्यटक किस पेंटिंग या मूर्ति के सामने कितना वक्त बिता रहा है। इससे दर्शकों की पसंद और उन्हें आ रही दिक्कतों को बिना औपचारिक फीडबैक फॉर्म के समझा जा रहा है।
क्रोएशिया में क्लॉड एआइ ने 2500 ऐतिहासिक व्यंजनों की रेसिपी दी
क्रोएशिया के ट्राकोस्कन म्यूजियम के विन्को कोवेक ने बताया कि एआइ की मदद से असंभव दिख रहे काम को संभव कर दिखाया। म्यूजियम की एक पुरानी जर्मन कुकबुक की भाषा जर्मन स्कॉलर के भी पल्ले नहीं पड़ी। उसका ट्रांसलेशन बड़ी चुनौती बन गया था और दशकों से जीरो प्रोग्रेस हुई थी। संस्थान ने नीतिगत फैसला लिया और रिसर्च बेस्ड एआइ टूल क्लॉड का इस्तेमाल किया। जिस अनुवाद और शोध में दशकों लग गए, वह एआइ के जरिए पूरा होने के करीब है। अब 2500 दुर्लभ व्यंजनों को प्रामाणिक रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित किया जा सकेगा। और इस व्यंजनों को म्यूजियम के रेस्टोरेंट के जरिये टूरिस्टों को परोसा जाएगा।
भारतीय संग्रहालयों में नीतिगत स्तर पर शून्य
भारत में संग्रहालयों में कर्मचारी चैटजीपीटी या क्लॉड जैसे एआइ टूल्स का इस्तेमाल करने लगे हैं। लेकिन भारतीय संग्रहालयों में एआइ के उपयोग, डेटा सुरक्षा, ऐतिहासिक प्रामाणिकता की जांच और नैतिक सीमाओं को लेकर अभी तक कोई संस्थागत नीति या एसओपी तैयार नहीं की गई है। बेंगलुरु के म्यूजियम ऑफ आर्ट एंड फोटोग्राफी ने एआइ के जरिए दिव्यांग कर्मचारियों को अनुवाद और ट्रांसक्रिप्शन के उपलब्ध कराए हैं।
67% संग्रहालयों के पास एआइ के लिए बजट नहीं
85 लाख रुपए से कम सालाना बजट वाले संग्रहालयों में केवल 39% ही एआइ का उपयोग कर पा रहे हैं, जबकि 8.5 करोड़ रुपए से अधिक बजट वाले 77% संग्रहालय एआइ इस्तेमाल कर रहे हैं। दुनिया भर के 67% संग्रहालयों के पास एआइ के लिए कोई बजट ही नहीं है और 83% संस्थानों में कर्मचारियों के लिए एआइ का कोई ट्रेनिंग उपलब्ध नहीं है।
55% में कोई आंतरिक नीति या दिशा-निर्देश नहीं
79% के लिए एआइ से फैलने वाली गलत व भ्रामक जानकारी सबसे बड़ी चिंता
81% में एआइ कंटेंट को सार्वजनिक करने से पहले मानव विशेषज्ञ अनिवार्य रूप से जांचते हैं
80% ने एआइ के उपयोग के लिए ट्रेनिंग की मांग की

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