लुधियाना
मिडिल ईस्ट में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब दवा इंडस्ट्री पर भी दिखने लगा है। पिछले 2 हफ्तों में दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल यानी एक्टिव फार्मा इंग्रीडिएंट्स की कीमतों में करीब 20% तक तेजी आई है। इनमें पैरासिटामोल की कीमतों में भी वृद्धि दर्ज की गई है जो सिरदर्द बढ़ाने जैसा है जबकि अन्य दवाओं में भी यह स्थिति जारी रह सकती है, पंजाब होलसेल कैमिस्ट एसोसिएशन के प्रधान सुरेंद्र दुग्गल तथा महासचिव जी.एस. चावला ने बताया कि युद्ध के कारण यूरोप से आने वाला कच्चा माल नहीं आ रहा, हालांकि चीन से कच्चा माल आ रहा है परंतु उसमें भी सप्लाई प्रभावित हुई है।
हालांकि चीन भारत की दवा कंपनियों के लिए सबसे बड़ा कच्चा माल सप्लायर है। सप्लाई में रुकावट से घरेलू उत्पादन पर दबाव बढ़ा है। आने वाले समय में दवाइयां की बढ़ती कीमतों का असर ग्राहकों की जेब पर भी पड़ सकता है। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि नई बैच की आने वाली दवाइयों के दाम 15 से 20% तक बढे़ हुए हो सकते हैं। उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, कई अहम कच्चे माल की कीमतों में तेज उछाल आया है। इसके अलावा, पैट्रोकैमिकल्स से बने फार्मास्यूटिकल सॉल्वैंट्स की कीमतें एक सप्ताह में बढ़नी शुरू हो गई हैं। इसी कारण दवा कंपनियों ने सरकार से दवाओं की कीमत बढ़ाने की अनुमति देने की मांग की है, ताकि बढ़ती लागत का भार वहन किया जा सके। भारत में दवाओं की कीमतें काफी हद तक नियंत्रित रहती हैं, इसलिए अचानक बढ़ी लागत को कंपनियां अकेले संभालना मुश्किल मान रही हैं।
सुरेंद्र दुग्गल ने कहा कि फार्मास्यूटिकल कंपनियां सरकार से निरंतर संपर्क बनाए हुए हैं परंतु हालात साफ दिखाई देते हैं कि आने वाले समय में युद्ध के कारण बढ़ी कीमतों का असर दवाइयों पर भी पड़ने लगेगा और कई जीवन रक्षक दवाइयां भी महंगी हो जाएंगी।

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