पंजाब विधानसभा के स्पीकर कुलतार सिंह संधवां ने आज इस बात पर जोर दिया कि सिख संस्थाएं और गुरुद्वारे कौम की सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पहचान के प्रतीक तथा इसकी शक्ति का स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि हमारे गुरुद्वारे हमारी अस्तित्व का केंद्र हैं, इनका प्रबंधन पारदर्शी होना चाहिए और ‘सरबत दा भला’ की भावना से चलना चाहिए।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की ऐतिहासिक भूमिका का हवाला देते हुए संधवां ने इसे एक सम्मानित संस्था बताया, जिसने एक सदी पहले ताकतवर ब्रिटिश साम्राज्य को झुकने पर मजबूर कर दिया था और सामूहिक पंथिक शक्ति के जरिए गुरुद्वारों को आजाद करवाया था। उन्होंने कहा कि उस समय हमारे पास न कोई सियासी ताकत थी और न ही आर्थिक बल, फिर भी गुरु की कृपा और विश्वास के साथ सब कुछ पारदर्शी तरीके से किया गया था।
संधवां ने कहा कि जब भी शिरोमणि कमेटी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं, तो उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सियासी कुश्ती का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारी अस्तित्व, हमारी सम्मानित संस्था और हमारी पहचान का सवाल है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा किसी खास परिवार के खिलाफ नहीं है, बल्कि एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रबंधन प्रणाली सुनिश्चित करने के बारे में है।
उन्होंने अपील की कि सम्मानित धार्मिक शख्सियतों द्वारा उठाई गई आलोचनाओं या चिंताओं को किसी व्यक्ति या खास परिवार को बचाने के लिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए और न ही इन्हें निजी हमलों में बदलना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष किसी परिवार के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह पंथ के लिए, हमारे धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक भविष्य के लिए है।
एकता की अपील करते हुए संधवां ने कौम से इस मुद्दे को टकराव की बजाय सुधार की दिशा में ले जाने का आह्वान किया और अरदास की कि ज्ञानी रघबीर सिंह तथा सिंह साहिब भाई रणजीत सिंह द्वारा जताई गई चिंताओं पर सुधार की भावना से गंभीरता के साथ विचार किया जाए।



