चंडीगढ़
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर ठगी मामले में अहम टिप्पणी करते हुए आरोपित को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपों की गंभीरता के बावजूद आरोपित की भूमिका सीमित होने और जांच पूरी हो जाने के मद्देनजर उसे निरंतर हिरासत में रखना उचित नहीं है।
जस्टिस मनीषा बत्रा की एकल पीठ आरोपित विक्रम सिंह की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह मामला उस साइबर ठगी से जुड़ा है, जिसमें एक सेवानिवृत्त प्रिंसिपल को वीडियो काल और फोन के जरिए 'डिजिटल अरेस्ट' में रखकर करीब 3.03 करोड़ रुपये ठग लिए गए थे।
मामले के अनुसार, 3 जनवरी 2025 को पीड़िता को कुछ लोगों ने खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसियों का अधिकारी बताकर फोन किया। उसे गंभीर आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी दी गई और लगातार वीडियो काल के जरिए निगरानी में रखा गया। उसे घर से बाहर न निकलने, किसी से संपर्क न करने और निर्देशों का पालन करने को मजबूर किया गया।
इस तरह उसे मानसिक रूप से ‘वर्चुअल कैद’ में रखकर भारी रकम अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करवाई गई। जांच में सामने आया कि ठगी की रकम को कई खातों के जरिए घुमाया गया। आरोपित विक्रम सिंह पर आरोप है कि उसने ठगी की रकम में से 4.26 लाख रुपये प्राप्त कर उसे क्रिप्टो करेंसी में बदलने में मदद की और इसके बदले कमीशन भी लिया
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपित 18 फरवरी 2025 से हिरासत में है, जांच पूरी हो चुकी है और मुकदमे के लंबा चलने की संभावना है। ऐसे में उसकी निरंतर कैद उचित नहीं है।
कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी का पीड़िता से सीधे संपर्क या धमकी देने में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं पाई गई। हालांकि, राज्य पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए इसे एक संगठित साइबर अपराध करार दिया और कहा कि पैसे के लेन-देन में शामिल हर कड़ी इस अपराध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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