शारदीय नवरात्र : शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना के लिए कई विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं. इन्हीं में से एक है संधि पूजा, जिसे महाष्टमी और महानवमी के मिलन के समय किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह समय मां दुर्गा के चामुंडा स्वरूप की पूजा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दौरान देवी की विशेष आराधना, पुष्पांजलि और दीपदान करने की परंपरा है. संधि पूजा में 48 मिनट का संधिकाल सबसे खास होता है. आइए जानते हैं संधि पूजा कब की जाएगी, इसका धार्मिक महत्व क्या है और इस दौरान किन नियमों का ध्यान रखना चाहिए.
संधि पूजा 2026 की तारीख और शुभ मुहूर्त
संधि पूजा की तारीख महाष्टमी और महानवमी की तिथियों के संधिकाल के आधार पर तय होती है. साल 2026 में शारदीय नवरात्र के दौरान यह पूजा 19 अक्टूबर को की जाएगी. पंचांग के अनुसार, संधि पूजा का समय सुबह 10 बजकर 27 मिनट से 11 बजकर 15 मिनट तक बताया गया है. इस दौरान कुल 48 मिनट का समय मिलता है.
संधि पूजा में महाष्टमी के अंतिम 24 मिनट और महानवमी के शुरुआती 24 मिनट शामिल होते हैं. इसी अवधि को संधिकाल कहा जाता है. चूंकि तिथियों का समय शहर के अनुसार अलग हो सकता है, इसलिए पूजा करने से पहले अपने स्थानीय पंचांग से मुहूर्त की पुष्टि जरूर करें.
क्या होता है संधि पूजा का धार्मिक महत्व?
हिंदू धार्मिक मान्यताओं में संधि पूजा को शक्ति की उपासना का विशेष अवसर माना जाता है. मान्यता है कि महाष्टमी और महानवमी के संधिकाल में मां दुर्गा ने चंड और मुंड नामक राक्षसों का वध करने के लिए चामुंडा स्वरूप धारण किया था. इसी वजह से इस समय देवी के इस स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है.
भक्त संधि पूजा के दौरान मां दुर्गा से साहस, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं. यह अनुष्ठान बुराई पर अच्छाई की जीत और अधर्म के अंत का भी प्रतीक माना जाता है. खासतौर पर बंगाल और पूर्वी भारत में दुर्गा पूजा के दौरान संधि पूजा का विशेष आयोजन किया जाता है.
संधि पूजा में 48 मिनट क्यों हैं खास?
संधि पूजा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका सीमित समय है. यह पूजा महाष्टमी की समाप्ति और महानवमी की शुरुआत के बीच की अवधि में की जाती है. इस समय को दोनों तिथियों का मिलन माना जाता है.
परंपरा के अनुसार, संधिकाल के दौरान मां दुर्गा की आराधना, मंत्र जाप, दीपदान और पुष्पांजलि की जाती है. इसीलिए पूजा का समय शुरू होने से पहले ही सभी आवश्यक सामग्री तैयार रखने की सलाह दी जाती है, ताकि अनुष्ठान निर्धारित अवधि में पूरा किया जा सके.
संधि पूजा में 108 दीपक जलाने की परंपरा
संधि पूजा के दौरान 108 दीपक जलाने की परंपरा कई जगहों पर प्रचलित है. धार्मिक मान्यताओं में दीपक को प्रकाश, आस्था और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है. भक्त दीप जलाकर मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं.
कुछ परंपराओं में देवी को 108 कमल के फूल अर्पित करने का भी विधान है. हालांकि, पूजा की सामग्री और विधि क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है. श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और पुरोहित के मार्गदर्शन के अनुसार पूजा कर सकते हैं.
संधि पूजा कैसे करें? जानें आसान विधि
संधि पूजा के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को साफ करके मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें. इसके बाद देवी के सामने दीपक जलाएं और फूल, अक्षत, फल तथा अपनी परंपरा के अनुसार भोग अर्पित करें.
– मां दुर्गा का ध्यान करें: देवी के चामुंडा स्वरूप का स्मरण करके पूजा शुरू करें.
– फूल और भोग अर्पित करें: मां को पुष्प, फल और अन्य पूजन सामग्री चढ़ाएं.
– मंत्र जाप और आरती करें: अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार देवी मंत्रों का जाप करें.
– दीपदान करें: संधि पूजा की परंपरा के अनुसार दीपक जलाएं.
– पुष्पांजलि अर्पित करें: मां दुर्गा से सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें.
पूजा के दौरान समय का ध्यान रखना जरूरी है. यदि किसी मंदिर या दुर्गा पूजा पंडाल में संधि पूजा में शामिल होना चाहते हैं, तो वहां के आयोजकों से पूजा का सही समय पहले ही जान लें.
संधि पूजा के दौरान किन बातों का रखें ध्यान?
संधि पूजा का मुहूर्त केवल 48 मिनट का होता है, इसलिए पूजा की तैयारियां पहले से कर लेनी चाहिए. दीपक, फूल, भोग और अन्य सामग्री समय पर तैयार रखें. पूजा करते समय श्रद्धा और एकाग्रता बनाए रखें तथा अपने स्थानीय पंचांग में बताए गए समय का पालन करें.

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