नई दिल्ली
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जारी संकट और ग्लोबल सप्लाई चेन पर बढ़ते दबाव के बीच भारत ने अपनी रणनीति साफ कर दी है. दुनिया जहां तेल की कमी से जूझ रही है, वहीं भारत ने बिना देरी किए रूसी कच्चे तेल की खरीद फिर से तेज कर दी है. भारत अपनी करीब 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, ऐसे में किसी भी ग्लोबल व्यवधान का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. यही वजह है कि अब फोकस सस्ते तेल से ज्यादा लगातार सप्लाई पर है।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 में भारत ने रूस से करीब 1.98 मिलियन बैरल प्रति दिन कच्चा तेल खरीदा. यह जून 2023 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. अप्रैल में यह आंकड़ा घटकर 1.57 मिलियन बैरल प्रति दिन पर आया है, लेकिन इसकी वजह मांग में कमी नहीं बल्कि तकनीकी कारण हैं. नायरा एनर्जी की रिफाइनरी में मेंटेनेंस शटडाउन के चलते अस्थायी गिरावट आई है. बाजार को उम्मीद है कि अगले महीने से फिर तेजी देखने को मिलेगी।
अब सप्लाई सिक्योरिटी है फोकस
वेस्ट एशिया से आने वाली सप्लाई में अनिश्चितता ने भारतीय रिफाइनरियों की प्राथमिकता बदल दी है. अब सवाल यह नहीं है कि तेल कितना सस्ता है, बल्कि यह है कि वह लगातार मिल पा रहा है या नहीं. ऊर्जा बाजार की विशेषज्ञ वंदना हरि (Vandana Hari) का कहना है कि “भारत जितना रूसी कच्चा तेल हासिल कर सकता है, उतना खरीद रहा है. जब तक पर्शियन गल्फ से सप्लाई बाधित रहेगी, तब तक भारत रूसी तेल की अधिकतम खरीद जारी रखेगा।
वहीं, पेट्रोलियम मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा (Sujata Sharma) ने कहा, “हमारी प्राथमिकता घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराना है. यह फैसला तकनीकी और व्यावसायिक व्यवहार्यता के आधार पर लिया जाता है।
पुरानी रणनीति की वापसी
2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने डिस्काउंट के चलते रूसी तेल की खरीद तेजी से बढ़ाई थी. उस समय भारत रूस का सबसे बड़ा खरीदार बन गया था. हालांकि 2025 में अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों के कारण खरीद में थोड़ी कमी आई, लेकिन मौजूदा संकट ने भारत को फिर उसी रणनीति की ओर लौटा दिया है।
घट रहा ग्लोबल स्टॉक, बढ़ रही टेंशन
ग्लोबल मार्केट में एक और संकेत चिंता बढ़ाने वाला है. समुद्र में जमा रूसी तेल का स्टॉक तेजी से घट रहा है. पिछले साल के अंत में यह करीब 155 मिलियन बैरल था, जो अब घटकर करीब 100 मिलियन बैरल रह गया है. इसका मतलब है कि डिमांड बढ़ रही है और सप्लाई पर दबाव लगातार बना हुआ है।

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