पटना
राज्य में एससी-एसटी (अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति) अत्याचार निवारण अधिनियम से जुड़े 51 हजार से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इन मुकदमों के जल्द निष्पादन के लिए 'ट्रायल इन एबसेंशिया' चलाया जाएगा।
ऐसे मुकदमे जिनमें दस साल, आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सजा का प्रविधान है और फरार अभियुक्त को विशेष न्यायालय के द्वारा अपराधी घोषित किया जा चुका है, उन मामलों में ट्रायल इन एबसेंशिया चलाने के लिए कोर्ट से लिखित अनुरोध किया जाएगा।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के अंतर्गत ट्रायल इन एबसेंशिया में फरार अभियुक्तों की अनुपिस्थति में भी उनके विरुद्ध मुकदमा शुरू करने और अभियुक्त की अनुपिस्थति में सजा सुनाने का अधिकार कोर्ट को दिया गया है।
अभियोजन निदेशालय के स्तर से एससी-एसटी के लंबित मुकदमों की समीक्षा बैठक में बताया गया कि राज्य के विशेष न्यायालयों में पुलिस पेपर के लिए 671 और आरोप गठन के लिए 516 मामले लंबित हैं।
इसी तरह सफाई साक्ष्य के लिए 288, बहस के स्तर पर 379 और निर्णय के स्तर पर 67 यानी कुल 734 कांड लंबित हैं। इन सभी लंबित कांडों का दो माह में त्वरित निष्पादन करने का टास्क अभियोजन अधिकारियों को दिया गया है।
कोर्ट में अधिक समय से बहस और निर्णय के स्तर पर लंबित मुकदमों की विवरणी विधि विभाग के साथ अभियोजन निदेशालय को उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया है
डीएम-एसपी की रिपोर्ट में सजा की संख्या में अंतर
समीक्षा बैठक में पाया गया कि जिलों के डीएम-एसपी के स्तर से मिलने वाली मासिक रिपोर्ट में सजा की संख्या में अंतर होता है। इसके लिए सही-सही मिलान कर रिपोर्ट भेजने का निर्देश दिया गया।
गवाहों की ससमय कोर्ट में उपिस्थति के लिए कोर्ट नायब की सूची भी निदेशालय ने तलब की है। कोर्ट में हाजिर न होने वाले गवाहों की सूचना जिले के एसपी के साथ अपराध अनुसंधान विभाग के कमजोर वर्ग की अपर पुलिस महानिदेशक को भी उपलब्ध कराने को कहा गया है। कंटेस्टेड मुकदमों में अभियुक्तों के कोर्ट से रिहा होने पर अपील दायर करने को भी कहा गया है।
ट्रायल इन एब्सेंशिया लागू करने वाल पहला राज्य है बिहार
बिहार देश का पहला राज्य है जिसने ट्रायल इन एब्सेंशिया के तहत कोर्ट में विचारण की प्रक्रिया शुरू की है। पिछले साल दिसंबर में ही इसकी शुरुआत हुई थी।
ट्रायल इन एब्सेंशिया में प्रविधान है कि यदि अभियुक्त या घोषित अपराधी मुकदमा से बचने के लिए भाग गया हो और उसे गिरफ्तार करने की तत्काल कोई संभावना न हो तो आरोप तय होने की तारीख से 90 दिनों की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि के बाद मुकदमा शुरू किया जा सकता है।

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