फिरोजपुर (पंजाब): सीमावर्ती जिला फिरोजपुर में राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया की दो दिवसीय यात्रा के दूसरे दिन आयोजित नशा विरोधी पदयात्रा ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। इस कार्यक्रम में शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल, डेरा ब्यास के प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों और भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रधान अश्विनी शर्मा की मौजूदगी ने सियासी समीकरणों को लेकर अटकलों को तेज कर दिया है।
आधिकारिक तौर पर यह पदयात्रा नशे के खिलाफ जन-जागरूकता अभियान का हिस्सा थी। राज्यपाल ने युवाओं को नशे से दूर रहने का संदेश दिया और समाज के विभिन्न वर्गों से इस सामाजिक बुराई के खिलाफ एकजुट होने की अपील की। हालांकि, कार्यक्रम में विभिन्न राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं की एक साथ उपस्थिति को केवल सामाजिक पहल तक सीमित नहीं देखा जा रहा।
अकाली-भाजपा रिश्तों पर नई चर्चा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लंबे समय बाद अकाली दल और भाजपा के शीर्ष नेताओं का एक मंच साझा करना भविष्य की संभावनाओं का संकेत हो सकता है। गौरतलब है कि तीन कृषि कानूनों के विरोध में शिरोमणि अकाली दल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से अलग होने का फैसला लिया था, जिसके बाद दोनों दलों के संबंधों में दूरी आ गई थी।
इसके बाद 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़े। चुनावी परिणाम दोनों के लिए अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा रही है कि पंजाब में प्रभावी राजनीतिक मुकाबले के लिए पारंपरिक सहयोगी दलों का साथ आना रणनीतिक रूप से लाभकारी हो सकता है।
पहले भी उठी थीं अटकलें
बीते समय में भी अकाली-भाजपा गठबंधन को लेकर कई संकेत सामने आए थे। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सार्वजनिक रूप से गठबंधन की संभावनाओं पर सकारात्मक रुख दिखाया था। हालांकि, इन बयानों के बावजूद औपचारिक स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं हो सकी।
पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के निधन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की श्रद्धांजलि यात्रा और भोग समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति ने भी गठबंधन की अटकलों को हवा दी थी। लेकिन वह चर्चा समय के साथ ठंडी पड़ गई।
क्या बदल रहे हैं सियासी समीकरण?
फिरोजपुर की इस पदयात्रा में सुखबीर सिंह बादल की सक्रिय भागीदारी और भाजपा प्रदेश नेतृत्व की मौजूदगी को राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि किसी भी दल की ओर से गठबंधन को लेकर आधिकारिक बयान नहीं आया है, फिर भी राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे संभावित संवाद की शुरुआत मान रहे हैं।
राज्यपाल की पहल को सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पंजाब की राजनीति में आगामी समय में नए समीकरण उभर सकते हैं, विशेषकर तब जब सभी दल भविष्य की चुनावी रणनीति पर मंथन कर रहे हैं।
फिलहाल यह देखना अहम होगा कि यह साझा मंच केवल एक सामाजिक कार्यक्रम तक सीमित रहता है या फिर आने वाले दिनों में राजनीतिक संवाद का आधार बनता है।

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