समुद्रयान मत्स्य 6000
अगले साल, यानी 2024 की शुरुआत में, भारत अपने पहले महासागर मिशन समुद्रयान के तहत एक मानवयुक्त पनडुब्बी को गहरे समुद्र में भेजेगा। ‘मत्स्य 6000’ नामक पनडुब्बी बंगाल की खाड़ी में परीक्षण की जाएगी। पहले ट्रायल में इसे 500 मीटर की गहराई में समुद्र में भेजा जाएगा। ये तीन भारतीय 2026 तक महासागर में 6000 मीटर की गहराई में जाएंगे।
भारत मानव पनडुब्बी बनाने में छठवां देश है। अमेरिका, रूस, जापान, फ्रांस और चीन ने पहले ही मानवयुक्त पनडुब्बी बनाई हैं। साथ ही, भारत सरकार इस अभियान के माध्यम से कोबाल्ट, निकल और सल्फाइड जैसे खनिजों और धातुओं को समुद्र तल से निकालने की कोशिश कर रही है, जो मोबाइल लैपटॉप जैसे उपकरणों को बनाते हैं।
NIOT के निदेशक जी.ए. रामदास ने बताया कि “समुद्रयान मत्स्य 6000” पनडुब्बी 12 से 16 घंटे तक बिना रुके चल सकती है। 96 घंटे तक ऑक्सीजन उपलब्ध रहेगा। 2.1 मीटर व्यास है। तीन लोग इसमें बैठ सकते हैं। 80 मिमी टाइटेनियम एलॉय से बनाया गया है। ये 6000 मीटर की गहराई पर 600 बार (दबाव मापने की इकाई) समुद्र तल के दबाव से अधिक दबाव झेल सकते हैं।
इसे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी (NIOT) के वैज्ञानिकों ने दो साल में तैयार किया है, जबकि NIOT की डिजाइन को रिव्यू किया जा रहा है। अभी वह इसका विश्लेषण कर रहे हैं। टाइटन नाम की एक पनडुब्बी जून 2023 में अटलांटिक ओशन में डूब गई। पांच अरबपति मारे गए थे। इस घटना के बाद NIOT ने “समुद्रयान मत्स्य 6000” की डिजाइन को बदलने का निर्णय लिया।
ग् लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए ई-वाहनों और उनके लिए बैटरियों की मांग में तेजी से वृद्धि हुई है, इसलिए समुद्र तल से धातुओं की निकासी की प्रक्रिया जारी है। वहीं, इनको बनाने में प्रयोग किए जाने वाले संसाधन विश्व भर में कम होते जा रहे हैं।
तांबा, निकल और लीथियम बैटरी समुद्र की गहराई में मिलते हैं। वहीं, समुद्र की गहराई में स् टील उद्योग के लिए आवश्यक मैगनीज और इलेक्ट्रिक कारों के लिए आवश्यक कोबाल् ट भी मिलता है।
तीन साल में दुनिया को 70% अधिक कोबाल्ट और दोगुना लीथियम की आवश्यकता होगी, ऐसा अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि 2030 तक कोबाल्ट और लीथियम की आवश्यकता लगभग चार गुना बढ़ जाएगी। मांग की तुलना में रासायनिक सामग्री का उत्पादन बहुत कम हो रहा है। इस अंतर को समायोजित करने के लिए, समुद्र की गहराई में खुदाई एक विकल्प हो सकता है।
UN से जुड़ी इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (ISA) ने सिर्फ 14 देशों को अध्ययन के लिए डीप सी खोजने की अनुमति दी है। चीन, रूस, दक्षिण कोरिया, भारत, ब्रिटेन, फ्रांस, पोलैंड, ब्राजील, जापान, जमैका, नाउरू, टोंगा, किरिबाती और बेल्जियम इन देशों में शामिल हैं ।
2021 में भारत सरकार ने ‘दीप ओशन मिशन’ को मंजूरी दी थी। यह समुद्री संसाधनों का पता लगाने और गहरे समुद्र में काम करने की प्रौद्योगिकी बनाने की कोशिश करता है। साथ ही, इसका उद्देश्य तेजी से ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देना है। समुद्री संसाधनों पर आधारित एक अर्थव्यवस्था को ब्लू अर्थव्यवस्था कहा जाता है।
वहीं, स्वीडन, आयरलैंड, जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, न्यूजीलैंड, कोस्टा रिका, चिली, पनामा, पलाऊ, फिजी और माइक्रोनेशिया के लोग डीप सी माइनिंग पर बैन लगाने की मांग कर रहे हैं।

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