मुंबई
दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां भविष्य की दिशा आज लिए जा रहे फैसलों से तय हो रही है. टेक्नोलॉजी,पूंजी और निवेश का खेल अब पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक हो गया है. इसी संदर्भ में गूगल का हालिया कदम बेहद महत्वपूर्ण है. जिस कंपनी के पास पहले से ही भारी नकद भंडार है. जिसने लगातार मुनाफे के नए रिकॉर्ड बनाए हैं. वही कंपनी बाजार से अतिरिक्त 80 अरब डॉलर जुटाने जा रही है. उदय कोटक ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस तरफ ध्यान दिलाया है और देसी कंपनियों को चेताया है. आईपीएल का मजा खत्म हुआ, अब भविष्य की तरफ देख लो. गूगल के आंकड़े अपने आप में चौंकाने वाले हैं. सालाना मुनाफा लगभग 160 अरब डॉलर, एक तिमाही का मुनाफा 62 अरब डॉलर और कुल मार्केट वैल्यू 4.5 खरब डॉलर. इतना मार्केट कैप तो निफ्टी 50 और सेंसेक्स की कंपनियों को मिलाकर भी नहीं है।
यहां सबसे अहम सवाल उठता है कि जब इतनी बड़ी और मजबूत कंपनी भी भविष्य को लेकर इतनी आक्रामक तैयारी कर रही है तो हम क्या कर रहे हैं. क्या हम भी उसी स्तर की तत्परता और दूरदृष्टि दिखा रहे हैं? हम अपनी स्थिति को देखें तो एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है. एक तरफ राजनीतिक स्थिरता और ताकत अपने चरम पर है. मजबूत नेतृत्व,लगातार चुनावी जीत और लगभग एकदलीय प्रभुत्व जैसी स्थिति है. कुल मिलाकर मोदी सरकार बेहद स्थिर है. दूसरी तरफ आर्थिक मोर्चे पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. ईरान वॉर ने चुनौतियां और बढ़ा दी है. विकास दर भले ही स्थिर दिखती हो लेकिन तीन चीजें चिंता पैदा कर रही है।
कुछ लोगों को आर्थिक स्थिति गिरने की बात पचती नहीं है. वे तुरंत बताने लगते हैं कि भारत बड़ी इकॉनमी में सबसे तेज बढ़ने वाला देश है. हमारी जीडीपी 6 परसेंट के ऊपर है. लेकिन सच्चाई इतनी चमकीली नहीं है. अगर दुनिया के सभी देशों के देखें तो भारत से ज्यादा जीडीपी वृद्धि दर नाइजर और इथियोपिया की है. प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के मामले में भी हम आठवें स्थान पर हैं. बांग्लादेश हमसे आगे है. हाल ही में पश्चिम एशिया जंग के कारण रुपया पिछले एक साल में लगभग 12% गिरा है और यह लगातार सातवां साल है जब इसमें गिरावट आई है. यह एक अजीब स्थिति है. महंगाई काबू में है. चालू खाता घाटा संतुलित है. विकास की गति भी ठीक है फिर भी मुद्रा कमजोर बनी हुई है।
आर्थिक विकास का असली इंजन निवेश होता है. खासतौर पर प्राइवेट इन्वेस्टमेंट और विदेशी निवेश (FDI). यही निवेश नई टेक्नोलॉजी लाता है,रोजगार पैदा करता है और देश को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ता है. लेकिन अपने देश में प्राइवेट सेक्टर का निवेश उतनी तेजी से बढ़ नहीं रहा है. सरकार ने बजट में विकास के काम के लिए 11 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है लेकिन सिर्फ सरकारी निवेश से काम नहीं चलेगा. इस पूरी तस्वीर को अगर गूगल के उदाहरण के साथ जोड़कर देखें तो फर्क साफ दिखाई देता है. वहां कंपनियां यह मानकर चल रही हैं कि भविष्य अनिश्चित है, प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और टेक्नोलॉजी तेजी से बदलेगी. इसलिए अभी से निवेश बढ़ाना जरूरी है. वहीं भारत में कई बार यह धारणा दिखती है कि हमारा बाजार इतना बड़ा है कि निवेशक खुद ही आएंगे. लेकिन वास्तविकता यह है कि निवेशक भरोसे और रिटर्न की गारंटी मिलने पर ही आते हैं।
सीआईआई रिपोर्ट के मुताबिक प्राइवेट सेक्टर ने सितंबर में 7.7 लाख करोड़ निवेश किया है. ये अच्छा संकेत है. लेकिन पिछले एक दशक के आंकड़े को देखें तो कॉरपोरेट निवेश जीडीपी के 12 प्रतिशत पर स्थिर है. इसे हर हाल में बढ़ाना होगा. हमारे पास एक विशाल बाजार, युवा आबादी, तेजी से बढ़ता डिजिटल इकोसिस्टम और वैश्विक स्तर पर बढ़ती रणनीतिक अहमियत है. लेकिन इन फायदों को वास्तविक आर्थिक ताकत में बदलने की जरूरत है।

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